मोदी के मुकाबले विपक्ष का चेहरे होंगी ममता ?

क्या 2024 के आम चुनाव में मोदी के मुकाबले ममता बनर्जी संयुक्त विपक्ष का चेहरा बन पाएंगी आज राजनीतिक हलकों में इस सवाल का जवाब मथा जा रहा है।

यह सही है कि बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी ने भाजपा को जिस तरह की पटखनी दी है उसने विपक्ष की नजरों में उनका कद काफी बढ़ा दिया है और बड हुए कद का ही फायदा उठाते हुए ममता बनर्जी इस समय राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ी भूमिका निभाने की तैयारियों में लग गई हैं।

यह भी सही है कि भाजपा के लिए भी अब 2014 जैसा माहौल नहीं है और उसके खाते में भी महामारी से लेकर साख पर बट्टा लगाने वाली तमाम चीजें दर्द हो चुकी हैं और निश्चित तौर पर विपक्ष अगले चुनाव में इन्हें ही भुनाने की कोशिश करेगा।

बंगाल चुनाव जीतने के बाद ही ममता बनर्जी ने यह संकेत दे दिया था कि वह राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष को एक करके एक बड़ी भूमिका निभाने जा रही हैं और इसी के तहत कांग्रेस जैसे मुख्य विपक्षी दल और राष्ट्रवादी कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दल को वह एक साथ ला चुकी है और दोनों को उन्हें बतौर प्रधानमंत्री पद का विपक्षी चेहरा बनाने में कोई एतराज भी नहीं है।

लेकिन इस शुरुआती कामयाबी के बाद भी ममता बनर्जी को अभी विपक्ष की एकजुटता कायम करने में काफी लंबा समय और रास्ता तय करना है क्योंकि उत्तर प्रदेश की प्रमुख पार्टी बहुजन समाज पार्टी और खुद बंगाल और आसपास सक्रिय वामपंथी दल उनके साथ अभी नहीं आ पाए हैं।

वैसे तो हर चुनाव से पहले सत्ता पक्ष के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की कोशिश है होती ही रहती हैं और इसके पहले भी पिछले चुनाव में आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एक करने की कोशिश की थी लेकिन वह कोशिश जमीन पर नहीं उतर सकी और वजह यह बताई गई इस तरह की कोशिश शुरू करने में काफी देरी हो चुकी थी और 1 साल से भी कम का समय बचा है।

लेकिन इस बार स्थितियां दूसरी हैं और ममता बनर्जी ने विपक्षी एक की शुरुआत आम चुनावों से कोई ढाई साल पहले ही कर दी है।

इस पहल का पहला कदम 21 जनवरी को ममता बनर्जी ने मोदी की तर्ज पर कई राज्यों में एक साथ पर्दे पर वर्चुअल रैलियों को संबोधित करते हुए कर दी है और सामान्य रूप से अपना पूरा भाषण बंगला में देने वाली ममता बनर्जी ने पहली बार अपने भाषण में हिंदी को भी बराबर का महत्व दिया है।

2014 में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार में इसी तौर तरीके का इस्तेमाल करके एक ही जगह पर भाषण देते हुए कई राज्यों में एक साथ अपना भाषण लोगों तक पहुंचाया था और अब वही तरीका ममता बनर्जी अपना रही है।

21 जुलाई ममता बनर्जी के लिए हमेशा खास दिन रहा है क्योंकि यह वही दिन है जब तृणमूल कांग्रेस के 13 कार्यकर्ता मारे गए थे और ममता बनर्जी इस दिन को शहीदी दिवस के रूप में मनाती हैं और बंगाल के अपने वोटरों और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते रही हैं पर इस बार उन्होंने बंगाल से बाहर निकलकर दूसरे राज्यों के गैर भाजपाई वोटरों को भी अपने साथ जोड़ने की इस दिन शुरुआत की है।

अब अगले कदम के तहत ममता बनर्जी संसद सत्र के दौरान दिल्ली में तमाम विपक्षी दलों की एक साथ मीटिंग करने की योजना बना रही है जो शायद अगले दो-चार दिनों में ही हो जाएगी और उसके बाद ही मोदी और भाजपा के खिलाफ इस विपक्षी एकता का ताना-बाना बुना जा सकेगा।