इस बार मायावती अपनाएंगी बसपा का अब तक का सबसे कामयाब चुनावी फार्मूला

 इस बार के विधानसभा चुनावों में बसपा प्रमुख मायावती शायद फिर से पंद्रह साल पुरानी उसी रणनीति को दोहराने जा रही हैं जिसके सहारे इस पार्टी ने पहली बार यूपी विधान सभा की आधी सीटें जीती थीं।

अजीब बात यह है कि बसपा के समर्पित वोटों से इनकार न कर पाने के बाद भी राजनीतिक हलकों में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो यह कहते मिल जाएंगे कि बसपा और मायावती की सियासत अब बिल्कुल ढलान पर है।

इसकी बड़ी वजह पिछले आम चुनाव में पार्टी का एक भी सीट ना  जीत पाना तो है ही साथ ही बसपा का पार्टी के तौर पर वह बुनियादी चरित्र भी जिसमे पार्टी अपनी तैयारियों को लेकर खामोशी ओढ़े रहती है।

फिलहाल इस बार खबर है कि यह पार्टी पिछड़े वर्गो और ब्राह्मणों पर कुछ ज्यादा ही भरोसा करेगी और हर जिलें में एक दो उम्मीदवार इन तबकों के जरूर होगें।

संगठनिक तौर पर इसी लिहाज से पार्टी की विधानसभा सीटों की बागडोर जिला कोआर्डिनेटरों के बदले मुख्य सेक्टर प्रभारियो के हाथों में होगी।

बसपा का मानना है कि उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जाति के कोई पचास फीसदी  मतदाता हैं जो सियासी तौर पर निर्णायक हो सकते हैं वहीं सामान्य जाति के उम्मीदवारों में भाजपा को रोकने के लिए ब्राह्मण मतदाता महत्वपूर्ण हैं।

साल 2007  में उत्तर प्रदेश के चुनाव में बसपा ने 403 सीटों में से 206 सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया था और तब बसपा को अब तक के सबसे ज्यादा 30 फीसदी वोट मिले थे।

इस बार फिर बसपा वही दांव चलने की तैयारी में हैं लेकिन तब बसपा ने प्रत्याशियों की घोषणा चुनाव से एक साल पहले ही कर दी थी पर इस बार यह काम लेट हो गया है फिर भी उम्मीद है  कि अगस्त और सितंबर के आखिरी हफ्ते तक पार्टी कोई 200 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर देगी।  

यह भी सही है कि जातीय वोटों की गोलबंदी में बसपा एक बार फिर अपनी भाईचारा कमेटियों को ही काम पर लगाएगी जिसमे अध्यक्ष उस जाति का और संयोजक अनुसूचित जाति का होता है।

देखना है कि मंडल प्रभारी को जिला कोर्डिनेटर्स से ज्यादा अहमियत देना इस बार पार्टी को कितना और कैसे फायदा पहुंचा सकती है