अब टीपू सुल्तान के बहाने लोगों को बांटने की सियासत

भारतीय इतिहास के दो महान योद्धाओं शिवाजी महाराज और टीपू सुल्तान ने भले एक दूसरे के खिलाफ कभी तलवार ना उठाई हो पर अब इन दोनों का नाम लेकर लोगों के बीच बंटवारे का बीज बोने की कोशिशें जरूर हो रही है।

मुंबई के एक गंदे और उपेक्षित पड़े डंपिंग ग्राउंड के 2 एकड़ क्षेत्र को साफ सुथरा बनाकर उसमें पार्क विकसित किया गया और मुंबई पालिका ने इस पार्क का नाम टीपू सुल्तान के नाम पर रखने का ऐलान कर दिया।

बस यही से लोगों को सियासत के तैयार जमीन मिल गई ऑल एक हिंदूवादी संगठन हिंदू जागृति समिति ने शाही नाका इलाके के डंपिंग ग्राउंड में बने इस पार्क का नाम टीपू सुल्तान के बजाय शिवाजी महाराज के नाम पर करने की मांग उठाई क्योंकि उसका कहना है कि टीपू सुल्तान मुस्लिम शासक था और उसने मंदिर तोड़े, जबरिया धर्म परिवर्तन कराए और और हिंदुओं पर ज्यादतियां की।

इस संगठन ने इसे लेकर मुंबई की मेयर किशोरी पडनेकर को ज्ञापन भी दिया और टीपू का नाम ना हटाए जाने पर उग्र आंदोलन की धमकी भी दे रखी है।

टीपू सुल्तान को खारिज करने का मतलब अपने इतिहास के उसी से को खारिज करना है जिसमें एक हिंदुस्तानी  शासक ने अंग्रेजों का विरोध करने में गुरु गोविंद सिंह की तरह अपने दो बेटों की कुर्बानी दी थी और अंग्रेजों ने उसके बेटों को बतौर जमानत बंधक बना लिया था।

हो सकता है कि किसी या किन्ही इतिहासकारो ने टीपू सुल्तान को हिंदू विरोधी के तौर पर लिखा हो और कुछ घटनाओं से उस की ऐसी छवि भी बनती हो तब भी अपने साम्राज्य को बचाने के लिए ही सही अंग्रेजों का विरोध जिस तरह उसने और उसके पिता हैदर अली ने किया उसे हम खारिज नहीं कर सकते और इतिहास के अच्छे हिस्सों को स्वीकार करके और गुरु को खारिज करना यह भी कोई अच्छा कदम नहीं कहा जाएगा खासकर तब जब हमें नहीं भूलना चाहिए कि जर्मनी ने भी दुनिया भर में को से गए हिटलर को अपने इतिहास से मिटा देने की कोशिश कभी नहीं की है।